80 वर्ष बाद: क्या भारत को तोड़ने वाली ताकतें नए रूप में फिर मजबूत हो रही हैं?
लेखक: कर्नल (डॉ.) देव आनंद लोहमारोर
अंतरराष्ट्रीय संबंध एवं सुरक्षा विशेषज्ञ
भारत ने स्वतंत्रता के 80 वर्ष पूरे कर लिए हैं। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन स्वतंत्रता का सूर्योदय विभाजन की त्रासदी के साथ हुआ। पंजाब और बंगाल का विभाजन हुआ, लाखों लोगों का जीवन उजड़ गया और लगभग डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए। इसलिए 1947 केवल स्वतंत्रता की तारीख नहीं, बल्कि यह याद दिलाने वाला इतिहास भी है कि जब राष्ट्रीय एकता कमजोर पड़ती है तो राजनीतिक विभाजन कितने विनाशकारी परिणाम ला सकता है।
आज प्रश्न यह नहीं है कि 1947 को बदला जा सकता है या नहीं। इतिहास पीछे नहीं लौटता। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वे ताकतें और वह मानसिकता, जिन्होंने कभी भारत को विभाजित और कमजोर करने का प्रयास किया था, आज नए रूपों में फिर सक्रिय हो रही हैं?
1947 का विभाजन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। दशकों की साम्प्रदायिक राजनीति, पृथक निर्वाचक मंडल एवं प्रतिनिधित्व, ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियाँ, मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद तथा ब्रिटिश सत्ता के शीघ्र हस्तांतरण का दबाव—इन सभी कारकों ने मिलकर अंतिम परिणाम को जन्म दिया। 1946 की कैबिनेट मिशन योजना ने तत्काल पाकिस्तान के निर्माण को स्वीकार नहीं किया था, बल्कि एक संयुक्त भारत के लिए संघीय ढाँचे का प्रस्ताव रखा था।
1947 के इतिहास का एक और महत्वपूर्ण पक्ष था। ब्रिटिश भारत के अलावा सैकड़ों देशी रियासतें भी अस्तित्व में थीं। ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होने के बाद इन रियासतों के सामने अलग-अलग संभावनाएँ थीं। यदि वे स्वतंत्र राजनीतिक इकाइयों के रूप में बनी रहतीं, तो स्वतंत्र भारत अनेक छोटे-छोटे राजनीतिक क्षेत्रों में बँट सकता था। इसी ऐतिहासिक परिस्थिति में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की भूमिका निर्णायक बनी। कूटनीति, बातचीत और जहाँ आवश्यक हुआ वहाँ निर्णायक कार्रवाई के माध्यम से सैकड़ों रियासतों का भारतीय संघ में एकीकरण किया गया। इसलिए 1947 की कहानी केवल भारत के विभाजन की कहानी नहीं है; यह विभाजन के बीच भारत के राजनीतिक पुनःएकीकरण की कहानी भी है।
हालाँकि इतिहास को भावनाओं के बजाय तथ्यों के आधार पर देखना आवश्यक है। हजारों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों ने जेल, कालापानी, फाँसी और अमानवीय यातनाएँ सहीं। गांधी, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, वीर सावरकर और असंख्य अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को किसी एक राजनीतिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं किया जा सकता। उनके तरीके और विचार अलग-अलग थे, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम पूरे राष्ट्र की विरासत है और उसे उसकी संपूर्ण जटिलता के साथ याद किया जाना चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पाकिस्तान बनने के बाद सभी मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए। करोड़ों मुसलमान भारत में ही रहे और आज भी भारत के सामाजिक ताने-बाने का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए विभाजन को इस सरल सूत्र में समेट देना कि पाकिस्तान “सभी मुसलमानों के लिए” बनाया गया था, इतिहास को अधूरा कर देगा।
फिर भी 1947 का सबसे बड़ा सबक स्पष्ट है—भारत की एकता को कभी स्वयंसिद्ध नहीं माना जा सकता।
आज खतरों का स्वरूप बदल चुका है। भारत को कमजोर करने वाली किसी शक्ति के लिए अब खुले तौर पर देश के भौगोलिक विभाजन की मांग करना आवश्यक नहीं है। आधुनिक अस्थिरता दुष्प्रचार, फर्जी समाचार, साइबर युद्ध, कट्टरपंथ, पहचान आधारित ध्रुवीकरण, आतंकवाद, अलगाववाद, आर्थिक व्यवधान और संस्थाओं के प्रति नागरिकों के विश्वास को कमजोर करने के माध्यम से भी पैदा की जा सकती है। आज युद्ध का मैदान केवल सीमा नहीं, बल्कि मन, सूचना तंत्र, अर्थव्यवस्था और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा भी हो सकता है।
इसी संदर्भ में 15 अगस्त 2026 को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने हथियारबंद नक्सलवाद के कमजोर होने के बाद “दिमागी नक्सल” की चुनौती की चेतावनी दी और कहा कि ऐसी मानसिकता हिंसा और अराजकता के अवसर तलाश सकती है तथा युवाओं को गलत दिशा में ले जा सकती है। उन्होंने ऐसी ताकतों को पहचानने और अलग-थलग करने तथा युवाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से यह चेतावनी महत्वपूर्ण है, लेकिन लोकतंत्र की मूल भावना की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। सरकार की आलोचना, शांतिपूर्ण प्रदर्शन या किसी नीति का विरोध अपने आप में राष्ट्रविरोधी नहीं है। लोकतंत्र वैध असहमति से मजबूत होता है। लेकिन जहाँ हिंसा, संगठित तोड़फोड़, आतंकवादी नेटवर्क, विदेशी हस्तक्षेप या संवैधानिक व्यवस्था को हिंसक ढंग से कमजोर करने के विश्वसनीय प्रमाण हों, वहाँ कानून को दृढ़ता, निष्पक्षता और समानता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। वास्तविक चुनौती यही है कि genuine जन-असंतोष और उसके जानबूझकर किए जाने वाले दुरुपयोग के बीच अंतर किया जाए।
यही सिद्धांत 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध, 2020–21 के किसान आंदोलन और हाल के छात्र आंदोलनों पर भी लागू होता है। हर आंदोलन को षड्यंत्र कहना गलत होगा और दूसरी ओर संगठित हिंसा, दुष्प्रचार या बाहरी प्रभाव के विश्वसनीय प्रमाणों की अनदेखी करना भी उतना ही गलत होगा। एक परिपक्व लोकतंत्र को असहमति के अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा—दोनों की रक्षा करनी होगी।
हाल के वर्षों में भारत ने राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों में परिवर्तन और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम ने क्षेत्र की संवैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन किया। समर्थकों ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना, जबकि इसके राजनीतिक और संवैधानिक प्रभावों पर गंभीर राष्ट्रीय बहस भी हुई।
आर्थिक और तकनीकी एकीकरण ने भी भारत को नई शक्ति दी है। यूपीआई ने छोटे दुकानदारों, श्रमिकों, उपभोक्ताओं और बड़े व्यवसायों को एक साझा डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जोड़ दिया है। यह केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि आधुनिक आर्थिक एकीकरण का माध्यम है, जिसने भौगोलिक और सामाजिक दूरियों को कम किया है।
विदेश नीति और सुरक्षा के स्तर पर भी भारत ने अधिक आत्मविश्वासी दृष्टिकोण अपनाया है। आतंकवाद के प्रति कठोर नीति, रणनीतिक स्वायत्तता, रक्षा आत्मनिर्भरता और वैश्विक शक्ति-संतुलन में राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने से भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत हुई है। 15 अगस्त 2026 के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने रक्षा तैयारी, ड्रोन, प्रतिरोधी ड्रोन प्रणालियों और हाइपरसोनिक तकनीक में नेतृत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने युद्ध के बदलते स्वरूप की ओर संकेत करते हुए कहा कि रिफाइनरी, बैंकिंग व्यवस्था, डेटा सेंटर और औद्योगिक प्रतिष्ठान भी भविष्य के संघर्षों में निशाना बन सकते हैं।
इसलिए 1947 और 2026 की चुनौतियाँ मूलतः अलग हैं।
1947 में प्रश्न था—क्या भारत एकजुट रहेगा या विभाजित होगा?
2026 में प्रश्न है—भारत अपनी एकता, संस्थाओं, सामाजिक विश्वास और आर्थिक शक्ति को सुरक्षित रखते हुए विश्व शक्ति कैसे बनेगा?
इसका उत्तर है—बिना भय के सतर्कता, बिना दमन के सुरक्षा और बिना भेदभाव के राष्ट्रीय एकता। भारत किसी एक धर्म, जाति या राजनीतिक विचारधारा का नहीं है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, आदिवासी, दलित, पिछड़े और समाज के प्रत्येक वर्ग भारत की शक्ति के अभिन्न अंग हैं। किसी समुदाय को कमजोर करके भारत मजबूत नहीं हो सकता। भारत तब मजबूत होगा जब प्रत्येक नागरिक यह महसूस करेगा कि उसका भविष्य भारत के भविष्य से अविभाज्य रूप से जुड़ा है।
सरदार पटेल ने भारत के राजनीतिक भूगोल को एकजुट किया था। आज की पीढ़ी की जिम्मेदारी उससे आगे की है—समाज, अर्थव्यवस्था, तकनीक, संस्थाओं और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करना।
1947 ने हमें सिखाया कि राजनीतिक विखंडन की कीमत कितनी भारी हो सकती है। 80 वर्ष बाद यह सबक उतना ही प्रासंगिक है कि राष्ट्रों को केवल सीमाओं पर ही नहीं, भीतर से भी चुनौती दी जा सकती है। भारत को विभाजित करने वाली ताकतें इतिहास बन चुकी हैं, लेकिन विभाजन की मानसिकता नए रूपों में फिर उभर सकती है, यदि समाज उसे पहचानना बंद कर दे।
इसलिए भारत को न तो इतिहास भूलने की आवश्यकता है और न ही हर असहमति को संदेह की दृष्टि से देखने की। आवश्यकता है—सतर्कता, तथ्य, संवैधानिकता, सामाजिक विश्वास और राष्ट्रीय एकता की।
हर विभाजनकारी शक्ति का उत्तर एक अधिक मजबूत भारत होना चाहिए—आर्थिक रूप से शक्तिशाली, तकनीकी रूप से सक्षम, सैन्य रूप से तैयार, सामाजिक रूप से संगठित और संवैधानिक रूप से आत्मविश्वासी।
1947 ने भारत को विभाजित किया था। 2026 भारत के लिए यह संकल्प लेने का वर्ष बने कि अब कोई भी शक्ति उसे भीतर से कमजोर नहीं कर सकेगी। यही स्वतंत्रता के 80 वर्षों की सबसे बड़ी सीख और आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय संकल्प होना चाहि,,
Priyanka Mali state head Rajasthan
