विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस की पाँचवीं वर्षगांठ: भारत विभाजन की मानवीय त्रासदी और इतिहास की सीख

कर्नल देव आनंद लोहामरोर

अंतरराष्ट्रीय संबंध एवं सुरक्षा विशेषज्ञ

15 अगस्त 1947 को जब भारत ने स्वतंत्रता की पहली सांस ली, उसी समय उपमहाद्वीप की धरती पर खून की नदियाँ बह रही थीं। वह दिन गौरव और त्रासदी—दोनों का प्रतीक बन गया। भारत को स्वतंत्रता मिली, लेकिन इसकी कीमत ऐसे विभाजन के रूप में चुकानी पड़ी, जिसने करोड़ों लोगों का जीवन उजाड़ दिया। यह केवल भू-भाग का विभाजन नहीं था, बल्कि एक गहरा सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक विघटन था, जिसे आज “विभाजन विभीषिका” के रूप में याद किया जाता है।

वर्ष 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अगस्त को “विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस” के रूप में मनाने की घोषणा की। इसका उद्देश्य उन लोगों को स्मरण करना था जिन्होंने विभाजन की त्रासदी झेली, साथ ही नफरत को अस्वीकार कर सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और मानवीय गरिमा को मजबूत करना था। यह दिवस भावी पीढ़ियों को धार्मिक संकीर्णता और विभाजनकारी राजनीति के विनाशकारी परिणामों से परिचित कराने का भी प्रयास है।

भारत का विभाजन औपचारिक रूप से लॉर्ड माउंटबेटन की 3 जून 1947 की योजना के आधार पर हुआ, लेकिन इसकी नींव उससे कहीं पहले रखी जा चुकी थी। मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा आगे बढ़ाए गए ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ में हिंदू और मुसलमानों को अलग-अलग राजनीतिक राष्ट्र माना गया, जिनके धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हितों को एक राष्ट्र-राज्य में समाहित करना कठिन बताया गया। यह विचार धीरे-धीरे मुस्लिम लीग की राजनीति का केंद्रीय आधार बना और पाकिस्तान की मांग एक शक्तिशाली राजनीतिक आंदोलन में बदल गई।

इस मांग को 1945-46 के चुनावों से निर्णायक राजनीतिक बल मिला, जब मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए आरक्षित अधिकांश सीटों पर जीत हासिल की। इससे जिन्ना के इस राजनीतिक दावे को मजबूती मिली कि वे मुस्लिम राजनीतिक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि, सभी भारतीय मुसलमान पाकिस्तान के समर्थक नहीं थे और कई मुस्लिम नेता विभाजन के विरोध में खड़े रहे। फिर भी, 1946 तक मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम लीग की सफलता ने पाकिस्तान की मांग को महत्वपूर्ण राजनीतिक समर्थन प्रदान कर दिया था।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन राजनीतिक और आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका था और भारत से शीघ्र बाहर निकलना चाहता था। माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेज किया। पंजाब और बंगाल की सीमाएं निर्धारित करने के लिए ब्रिटिश वकील सर साइरिल रेडक्लिफ को नियुक्त किया गया, जिन्हें भारत का पूर्व अनुभव नहीं था। कुछ ही सप्ताह में खींची गई इन रेखाओं ने समुदायों, परिवारों और पीढ़ियों पुराने पैतृक घरों को विभाजित कर दिया।

सीमाओं की घोषणा के बाद व्यापक हिंसा भड़क उठी। पंजाब और बंगाल में बड़े पैमाने पर रक्तपात हुआ, जबकि सिंध सहित अन्य क्षेत्रों में भी विस्थापन और सामाजिक उथल-पुथल हुई। अनुमानतः डेढ़ से दो करोड़ लोग विस्थापित हुए, जबकि मृतकों की संख्या के अनुमान कई लाख से लेकर लगभग 10–15 लाख या उससे अधिक तक हैं। लाखों महिलाओं को बलात्कार, अपहरण और क्रूर हिंसा का सामना करना पड़ा। मृतकों से भरी रेलगाड़ियाँ विभाजन की भयावहता का प्रतीक बन गईं। मंदिरों, मस्जिदों और बस्तियों पर हमले हुए तथा परिवार बिखर गए।

पंजाब को असाधारण स्तर की त्रासदी झेलनी पड़ी। पाकिस्तान में शामिल होने वाले क्षेत्रों से हिंदू और सिख भारत की ओर आए, जबकि भारत के हिस्से में आए क्षेत्रों से अनेक मुसलमान पाकिस्तान की ओर चले गए। लाहौर, अमृतसर, रावलपिंडी और असंख्य गांवों ने ऐसी हिंसा देखी जिसकी कल्पना करना भी कठिन है। बंगाल में भी बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ। सिंध में बड़ी संख्या में हिंदू परिवारों ने अपने पैतृक घर, व्यवसाय और सामाजिक परिवेश छोड़कर भारत की ओर पलायन किया। यह त्रासदी किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं थी; तीनों समुदायों ने भारी पीड़ा और क्षति झेली।

शरणार्थियों की पीड़ा सीमा पार करने के साथ समाप्त नहीं हुई। परिवार दिल्ली, मुंबई और देश के अन्य हिस्सों में पहुंचे, अपने साथ कुछ सामान और उन घरों की स्मृतियां लेकर जिन्हें वे शायद कभी दोबारा नहीं देख सके। पंजाबी हिंदू और सिख शरणार्थियों के साथ सिंधी हिंदू परिवारों ने भी नए परिवेश में अपने जीवन का पुनर्निर्माण किया। पुनर्वास केवल घर और रोजगार प्राप्त करने का प्रश्न नहीं था; इसका अर्थ पैतृक संपत्ति, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक स्मृतियों को पीछे छोड़ना भी था।

भारत सरकार ने विस्थापितों के पुनर्वास के लिए व्यापक व्यवस्थाएं विकसित कीं। घर, भूमि, रोजगार, आर्थिक सहायता, मुआवजा और संपत्ति के दावों से संबंधित अनेक उपाय किए गए। फिर भी समस्या का पैमाना इतना विशाल था कि इसके कानूनी और आर्थिक प्रभाव दशकों तक बने रहे। हर संपत्ति का दावा केवल एक कानूनी फाइल नहीं था; उसके पीछे किसी परिवार की उजड़ी हुई जिंदगी और खोया हुआ घर था।

विभाजन ने भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य को भी बदल दिया। विस्थापित समुदाय अपने साथ भाषाएं, साहित्य, खान-पान, लोक परंपराएं, कला और स्मृतियां लेकर आए। पंजाबी और सिंधी समुदायों ने नए स्थानों पर अपने सांस्कृतिक जीवन का पुनर्निर्माण किया और अपनी विरासत को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाया। अमृतसर और नई दिल्ली के Partition Museum जैसे संस्थान मौखिक इतिहास, तस्वीरों, दस्तावेजों और व्यक्तिगत गवाहियों के माध्यम से इस त्रासदी की स्मृतियों को संरक्षित कर रहे हैं।

विभाजन को नफरत को जीवित रखने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास से सीखने के लिए याद किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य भावी पीढ़ियों को यह समझाना है कि साम्प्रदायिक भय, राजनीतिक विभाजन और आपसी अविश्वास किस तरह पूरे समाज को तबाह कर सकते हैं। राष्ट्रीय एकता केवल राजनीतिक सीमाओं से नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास, पारस्परिक सम्मान और मानवीय गरिमा से मजबूत होती है।

भारत का विभाजन किसी एक घटना या एक व्यक्ति का परिणाम नहीं था। ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियां, सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी, साम्प्रदायिक राजनीतिक लामबंदी, आपसी अविश्वास, संवैधानिक मतभेद और राजनीतिक समझौते की विफलता—इन सभी ने परिस्थितियां तैयार कीं। मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग एक केंद्रीय राजनीतिक शक्ति बन गई। लेकिन इसके बावजूद ब्रिटिश भारत की बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी ने भारत में ही रहना चुना। इस प्रकार विभाजन ने राजनीतिक भूगोल को तो बांट दिया, लेकिन उपमहाद्वीप के गहरे मानवीय और सांस्कृतिक संबंधों को समाप्त नहीं कर सका।

1947 के घाव 1947 में ही समाप्त नहीं हुए। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध, तनाव और विवादों ने विभाजन की विरासत को बार-बार जीवित किया। कश्मीर इसका सबसे गंभीर और दीर्घकालिक परिणाम बना, जबकि आपसी अविश्वास ने दशकों तक दक्षिण एशिया की राजनीति को प्रभावित किया।

आज, जब भारत अपनी स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है, विभाजन के दर्दनाक पन्नों को इतिहास से मिटाया नहीं जा सकता। “विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस” केवल एक रस्मी आयोजन नहीं होना चाहिए। यह उन लोगों की पीड़ा को सम्मान देने और भावी पीढ़ियों को चेतावनी देने का अवसर होना चाहिए कि जब राजनीतिक पहचान और साम्प्रदायिक भय मानवीय संबंधों से ऊपर हो जाते हैं, तो सबसे बड़ी कीमत सामान्य नागरिकों को चुकानी पड़ती है।

विभाजन का स्मरण किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा पैदा करने के लिए नहीं होना चाहिए। हिंदू, मुस्लिम और सिख—तीनों समुदायों ने उस दौर में पीड़ा, विस्थापन और अपनों को खोने का दर्द झेला। विभाजन की सच्ची सीख उस सामूहिक त्रासदी को समझने में है जिसने पूरे उपमहाद्वीप को बदल दिया।

विभाजन हमें सिखाता है कि राष्ट्र संविधान, समानता, नागरिकता और मानवता के मूल्यों से मजबूत होते हैं। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें मानवीय संबंधों और राष्ट्रीय एकता से बड़ा नहीं बनने दिया जाना चाहिए।

विभाजन की स्मृति हमें यह संकल्प दे कि राजनीतिक संघर्ष कभी उस स्थिति तक न पहुंचे, जहां किसी व्यक्ति की पहचान उसके पड़ोसी से नफरत का कारण बन जाए। इतिहास को याद करने का उद्देश्य अतीत की नफरत को जीवित रखना नहीं, बल्कि उसकी पुनरावृत्ति को रोकना होना चाहिए।

सीमाएं भूमि को विभाजित कर सकती हैं, लेकिन मानवता को नहीं। विभाजन इतिहास बन चुका है, लेकिन उसकी सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

Priyanka Mali state head Rajasthan