स्टेट ब्यूरो प्रियंका माली की रिपोर्ट

​लेखक: कर्नल देव आनंद लोहामरोर

(सिक्योरिटी एंड इंटरनेशनल अफेयर्स एक्सपर्ट)…

भारत का विभाजन केवल धार्मिक आधार पर दो देशों का निर्माण भर नहीं था, बल्कि उसके भीतर आने वाले दशकों में भारत को सामरिक रूप से कमजोर करने की एक गहरी भू-राजनीतिक सोच भी छिपी हुई थी। बंगाल का विभाजन और पूर्वी पाकिस्तान का निर्माण केवल सीमाओं का पुनर्गठन नहीं था, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर को मुख्य भूमि से काटने की एक दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौती भी थी। आज जिस क्षेत्र को हम “सिलीगुड़ी कॉरिडोर” या “चिकन नेक” के नाम से जानते हैं, वह उसी ऐतिहासिक भूल और राजनीतिक निर्णयों का परिणाम है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर पश्चिम बंगाल के उत्तर में स्थित लगभग 60 किलोमीटर लंबा अत्यंत संवेदनशील गलियारा है, जिसका सबसे संकीर्ण बिंदु (Narrowest Point) मात्र 20 से 22 किलोमीटर चौड़ा है। यह संकरा मार्ग भारत के आठ पूर्वोत्तर राज्यों — असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम — को शेष भारत से जोड़ता है। भौगोलिक रूप से यह सीधे असम और सिक्किम से जुड़कर पूरे पूर्वोत्तर की जीवनरेखा बनता है। इसके एक तरफ नेपाल, दूसरी तरफ बांग्लादेश, ऊपर भूटान और उससे आगे चीन का तिब्बत (चुम्बी घाटी) क्षेत्र स्थित है। यही कारण है कि दुनिया के सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक गलियारों में इसकी गिनती होती है।

विशेष रूप से छिटगांव हिल ट्रैक्ट्स का मामला भारत की सामरिक दृष्टि से सबसे विवादित निर्णयों में से एक माना जाता है। लगभग 13,295 वर्ग किलोमीटर में फैला यह पहाड़ी क्षेत्र वर्तमान दक्षिण-पूर्वी बांग्लादेश में स्थित है, जिसमें रंगामाटी, खग्राछारी और बांदरबन जिले आते हैं। इसकी लंबाई उत्तर से दक्षिण तक लगभग 180 किलोमीटर मानी जाती है। इसके उत्तर में भारत के मिजोरम और त्रिपुरा क्षेत्र लगते हैं, पूर्व में म्यांमार की सीमा है, जबकि दक्षिण-पश्चिम दिशा में यह क्षेत्र बे ऑफ बंगाल की सामरिक समुद्री दिशा की ओर जुड़ता है। विभाजन के समय यहां बौद्ध चकमा और अन्य गैर-मुस्लिम समुदायों की भारी आबादी होने के बावजूद इसे पूर्वी पाकिस्तान को सौंप दिया गया। सामरिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह क्षेत्र भारत के पास रहता, तो पूर्वोत्तर भारत को सीधे समुद्री पहुंच और कहीं अधिक मजबूत रणनीतिक गहराई (Strategic Depth) मिल सकती थी। आज चीन के बढ़ते प्रभाव और बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में उसकी सक्रियता को देखते हुए यह ऐतिहासिक निर्णय और भी अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देता है।

सवाल यह है कि जब पूरे देश को सिलीगुड़ी कॉरिडोर की संवेदनशीलता का एहसास था, तो दशकों तक इस दिशा में निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक वामपंथी सरकारों का शासन रहा, जिसके बाद तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। इन वर्षों में राष्ट्रीय सुरक्षा की अपेक्षा वोट बैंक राजनीति और सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों (Demographic Shifts) पर पर्याप्त कठोरता नहीं दिखाई गई। सीमा सुरक्षा बल (BSF) द्वारा कई बार सीमा पर बाड़ निर्माण, आधुनिक निगरानी तंत्र और सड़क अवसंरचना को मजबूत करने के प्रयास किए गए, लेकिन राज्य स्तर पर भूमि अधिग्रहण में देरी, स्थानीय प्रशासनिक अनुमति की अड़चनों और राजनीतिक विरोध के कारण अनेक सामरिक परियोजनाएँ वर्षों तक अटकी रहीं। भारत-बांग्लादेश सीमा के कई हिस्सों में घुसपैठ, मवेशी तस्करी और जाली नोटों (FICN) का नेटवर्क बना रहा। तीस्ता जल समझौते जैसे मुद्दों पर भी केंद्र और राज्य के बीच टकराव ने भारत की सामरिक स्थिति को प्रभावित किया। यदि सीमावर्ती जिलों में अवैध घुसपैठ और जनसांख्यिकीय असंतुलन पर समय रहते राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि मानकर कठोर नीति अपनाई जाती, तो आज स्थिति कहीं अधिक नियंत्रित हो सकती थी। यही कारण है कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर केवल भूगोल का विषय नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी प्रश्न बन गया।