दंदरौआ धाम में भव्य कलश यात्रा के साथ श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ

संसार में माता-पिता से बड़ा कोई हितैषी नहीं: संत रमेश भाई ओझा

ग्वालियर। मध्यप्रदेश के ग्वालियर अंचल स्थित प्रसिद्ध दंदरौआ धाम में बुधवार को भव्य कलश यात्रा के साथ श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ हुआ। कथा के प्रथम दिन प्रख्यात संत रमेश भाई ओझा ने माता-पिता के सम्मान, गुरु की आज्ञा के पालन और मन पर नियंत्रण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को जीवन में संस्कार, अनुशासन और भक्ति का मार्ग अपनाने का संदेश दिया।

संत रमेश भाई ओझा ने कहा कि आजकल अनेक बच्चे माता-पिता की बातें सुनते तो हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं करते। माता-पिता और गुरु की आज्ञा का पालन करने में ही व्यक्ति का कल्याण है। उन्होंने कहा कि हमें इस विश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए कि माता-पिता सदैव अपनी संतान का हित चाहते हैं, क्योंकि संसार में माता-पिता से बड़ा हितैषी कोई नहीं है।

भव्य कलश यात्रा के साथ हुआ कथा का शुभारंभ

श्रीमद्भागवत कथा के शुभारंभ से पूर्व दंदरौआ धाम में भव्य कलश यात्रा निकाली गई। यात्रा में पीतांबर धारण किए माताओं और बहनों के साथ बटुक ब्राह्मण सिर पर कलश लेकर शामिल हुए। कथा के यजमान अनूप मिश्रा सिर पर श्रीमद्भागवत पोथी रखकर नंगे पैर यात्रा में चले। इस दौरान संपूर्ण दंदरौआ धाम की परिक्रमा की गई। इसके पश्चात वैदिक आचार्यों ने विधि-विधान से व्यास पीठ का पूजन कराया और कथा का विधिवत शुभारंभ हुआ।

ग्वालियर में ही तय हो गई थी दंदरौआ की भागवत कथा

कथा के दौरान संत रमेश भाई ओझा ने बताया कि जब वे ग्वालियर के फूलबाग में कथा करने आए थे, तब दंदरौआ धाम में दर्शन के लिए भी पहुंचे थे। उसी दौरान धाम के महामंडलेश्वर रामदास महाराज ने यहां श्रीमद्भागवत कथा आयोजित कराने की इच्छा व्यक्त की थी। समय की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण आयोजन में कुछ विलंब हुआ, लेकिन हनुमानजी की कृपा से अब ग्वालियर अंचल में कथा श्रवण और वाचन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण बड़े सौभाग्य से मिलता है, इसलिए ऐसे अवसर को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।

गुरु की वाणी को ब्रह्म वाक्य मानकर करें अनुसरण

संत रमेश भाई ओझा ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि गुरु के प्रति सच्चा सम्मान, उनकी आज्ञा और मार्गदर्शन व्यक्ति को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। गुरु की वाणी को ब्रह्म वाक्य मानकर उसका अनुसरण करना चाहिए। योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में नियम, संयम और अनुशासन के साथ ज्ञान प्राप्त करने से व्यक्ति की बुद्धि और विवेक प्रखर होते हैं।

उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर भी विचार व्यक्त करते हुए कहा कि केवल अच्छे अंक प्राप्त करने के उद्देश्य से अनुचित साधनों का सहारा लेना उचित नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व का विकास होना चाहिए।

मन को नियंत्रित करने से भक्ति मार्ग होगा प्रशस्त

मन की चंचलता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि मन हमेशा किसी न किसी आकर्षण और सुख की तलाश में लगा रहता है। जो व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित करना सीख लेता है, वही भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ पाता है। वैराग्य और निरंतर अभ्यास के माध्यम से मन को स्थिर किया जा सकता है।