कटनी में 100 करोड़ की सरकारी जमीन पर भूमाफियाओं का कथित कब्जा! सात एकड़ संपत्ति पर खतरा, सात साल से सो रहा नगर निगम?
प्रियदर्शनी बस स्टैंड के सामने रचना नगर की बेशकीमती जमीन पर निजी बताकर खरीद-फरोख्त और निर्माण के आरोप; 2019 से शिकायतों का दौर जारी, न सीमांकन हुआ, न बाउंड्री बनी
कटनी। शहर के बीचोंबीच स्थित नगर पालिक निगम की करोड़ों रुपये की बेशकीमती जमीन आखिर किसके भरोसे है? जिस सरकारी संपत्ति की कीमत 100 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है, उसकी सुरक्षा को लेकर नगर निगम की कथित उदासीनता अब गंभीर सवालों के घेरे में है। मामला प्रियदर्शनी बस स्टैंड के सामने रचना नगर कॉलोनी और राधिका होटल के पीछे स्थित लगभग 7 एकड़ (2.86 हेक्टेयर) जमीन का है। आरोप है कि नगर निगम के नाम दर्ज इस बेशकीमती भूमि को निजी बताकर खरीद-फरोख्त की जा रही है, रजिस्ट्रियां हो रही हैं और मकानों का निर्माण भी कराया जा रहा है। यदि ये आरोप सही हैं तो यह सरकारी संपत्ति की सुरक्षा में बड़ी चूक और शहर के भविष्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस जमीन को सुरक्षित कराने के लिए वर्ष 2019 से लगातार शिकायतें की जा रही हैं। सक्रिय कार्यकर्ता एवं स्थानीय नागरिक सुयश पुरवार ने नगर निगम, सीएम हेल्पलाइन, महापौर और कलेक्टर तक कई बार लिखित शिकायतें पहुंचाईं, लेकिन उनके अनुसार आज तक न तो जमीन का विधिवत सीमांकन कराया गया और न ही सुरक्षा के लिए बाउंड्री वॉल बनाई गई। सवाल यह है कि सात साल तक शिकायतों के बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों की नींद क्यों नहीं टूटी? क्या सरकारी जमीन की सुरक्षा के लिए भी किसी बड़े हादसे या विवाद का इंतजार किया जा रहा है?
सरकारी जमीन पर कथित खरीद-फरोख्त, जिम्मेदारों की चुप्पी क्यों?
शिकायतकर्ता का आरोप है कि आसपास सक्रिय कुछ लोग नगर निगम की इस जमीन को निजी बताकर आम लोगों को बेच रहे हैं। कथित तौर पर रजिस्ट्री और निर्माण कार्य भी जारी हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो सबसे बड़ा सवाल उन दस्तावेजों की वैधता पर खड़ा होता है, जिनके आधार पर सरकारी भूमि की खरीद-फरोख्त की जा रही है।
आखिर जमीन का स्वामित्व रिकॉर्ड क्या कहता है? किसके नाम पर रजिस्ट्रियां हुईं? निर्माण की अनुमति किस आधार पर मिली? राजस्व विभाग और नगर निगम ने अब तक इसकी संयुक्त जांच क्यों नहीं कराई? इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है, ताकि सरकारी जमीन खरीदने वाले आम नागरिक भी किसी संभावित कानूनी विवाद में न फंसें।
100 करोड़ की जमीन से नगर निगम कमा सकता है करोड़ों का राजस्व
सुयश पुरवार का कहना है कि इस जमीन को केवल कब्जों से बचाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि इसे कटनी के विकास का बड़ा केंद्र बनाया जा सकता है। वर्ष 2019 में ही उन्होंने इस भूमि के जनहितकारी और व्यावसायिक उपयोग के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे।
इनमें भव्य नगर निगम मार्केट कॉम्प्लेक्स, इंदौर की तर्ज पर 56 दुकानों वाला चौपाटी क्षेत्र, हॉकर्स जोन, तिब्बती विंटर मार्केट, मल्टीलेवल पार्किंग, सुलभ शौचालय, त्योहारी बाजार, शासकीय विद्यालय और हरा-भरा पार्क विकसित करने के प्रस्ताव शामिल हैं।
इन योजनाओं के क्रियान्वयन से छोटे व्यापारियों को व्यवस्थित रोजगार स्थल मिल सकता है, शहर की पार्किंग समस्या कम हो सकती है और नगर निगम को किराये एवं अन्य माध्यमों से स्थायी आय प्राप्त हो सकती है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस जमीन से शहर का भविष्य संवारा जा सकता है, उसी जमीन की सुरक्षा पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं।
नगर निगम की आर्थिक स्थिति पर भी बड़ा सवाल
एक ओर नगर निगम अपनी आय बढ़ाने और विकास कार्यों के लिए संसाधन जुटाने की कोशिश करता है, दूसरी ओर शहर के बीच मौजूद सात एकड़ की बेशकीमती संपत्ति का समुचित उपयोग और संरक्षण नहीं हो पा रहा। यदि यह भूमि वास्तव में निगम के स्वामित्व में है, तो इसकी सुरक्षा और विकास के लिए अब तक ठोस पहल क्यों नहीं हुई? क्या निगम के पास अपनी संपत्ति का पूरा रिकॉर्ड और वास्तविक कब्जे की स्थिति तक उपलब्ध नहीं है?
BNS के तहत जांच, दोषियों पर कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि सरकारी जमीन को निजी बताकर बेचने, कथित फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल, धोखाधड़ी और अवैध कब्जे के आरोपों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। जांच में अपराध प्रमाणित होने पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सुसंगत धाराओं के तहत दोषियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर कठोर कार्रवाई की जाए।
अब जवाबदेही से नहीं बच सकते जिम्मेदार अधिकारी
सुयश पुरवार ने नगर निगम आयुक्त से तत्काल संयुक्त सीमांकन, जमीन की वास्तविक स्थिति का खुलासा, अवैध कब्जों की जांच और पूरी भूमि पर बाउंड्री वॉल निर्माण की मांग की है। साथ ही भूमि के जनहितकारी उपयोग के लिए समयबद्ध विकास योजना तैयार करने की बात कही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी रिकॉर्ड में जमीन नगर निगम की है, तो फिर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? सात साल की शिकायतों के बाद भी यदि सीमांकन और बाउंड्री नहीं बन पाई, तो आखिर जवाबदेही किसकी तय होगी?
कटनी की यह सात एकड़ जमीन अब सिर्फ एक सरकारी भूखंड नहीं, बल्कि नगर निगम की कार्यशैली, प्रशासनिक जवाबदेही और शहर के सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा की परीक्षा बन चुकी है। अब देखना होगा कि प्रशासन भूमाफियाओं पर कार्रवाई कर सरकारी संपत्ति बचाता है या फिर यह बेशकीमती जमीन भी धीरे-धीरे विवादों और कब्जों की भेंट चढ़ जाती है।
