क्या भारत में भीड़ के दबाव से शासन चलेगा? लोकतंत्र, कानून और नागरिक सुरक्षा पर नए प्रश्न
कर्नल (डॉ.) देव आनंद लोहमरोर
लोकतंत्र में सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी होती हैं, लेकिन उतना ही सत्य यह भी है कि लोकतंत्र का संचालन भीड़ के दबाव से नहीं बल्कि संविधान, कानून और संस्थागत प्रक्रियाओं से होना चाहिए। यदि किसी निर्णय का आधार सड़क पर उतरी भीड़, सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान, पुलिस पर हमले, यातायात का ठप हो जाना और राष्ट्रीय राजधानी का सामान्य जीवन बाधित होना बन जाए, तो यह केवल एक सरकार का प्रश्न नहीं रह जाता; यह पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।
हाल के घटनाक्रम में सरकार ने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा स्वीकार कर लिया और आंदोलन की प्रमुख मांगों को भी स्वीकार किया। यह सरकार का राजनीतिक निर्णय हो सकता है, किंतु इसके बाद एक बड़ा प्रश्न अनिवार्य रूप से खड़ा होता है—क्या इससे यह संदेश जाएगा कि यदि पर्याप्त दबाव बनाया जाए, पर्याप्त अव्यवस्था फैलाई जाए और राजधानी को ठप कर दिया जाए, तो सरकार अंततः झुक जाएगी? यदि ऐसा संदेश समाज में स्थापित होता है तो भविष्य में हर संगठित समूह इसी मॉडल को अपनाने का प्रयास करेगा।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तरदायित्व का है। यदि किसी परीक्षा में अनियमितता हुई, तो उसकी जांच अवश्य होनी चाहिए और दोषियों को कठोर दंड मिलना चाहिए। लेकिन समान रूप से यह भी आवश्यक है कि सुरक्षा व्यवस्था, खुफिया तंत्र, कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा में यदि कहीं विफलता हुई है, तो उसकी भी स्वतंत्र समीक्षा हो। केवल राजनीतिक इस्तीफा पर्याप्त उत्तर नहीं हो सकता। जनता यह जानना चाहती है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न ही क्यों हुई और भविष्य में इसे रोकने की क्या व्यवस्था बनाई गई है।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध का अधिकार मौलिक है, लेकिन हिंसा का अधिकार किसी को प्राप्त नहीं है। यदि सड़कें अवरुद्ध हों, अस्पतालों तक पहुँच बाधित हो, मेट्रो स्टेशन बंद करने पड़ें, पुलिसकर्मी घायल हों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचे, तो यह केवल एक आंदोलन नहीं रह जाता; यह लाखों सामान्य नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लंघन बन जाता है। लोकतंत्र का पहला दायित्व शांतिपूर्ण नागरिक की सुरक्षा है, न कि हिंसक तत्वों के सामने राज्य की निष्क्रियता।
यदि किसी व्यक्ति या संगठन ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है, तो उसकी निष्पक्ष पहचान होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय भी अनेक मामलों में सार्वजनिक संपत्ति की क्षति की भरपाई दोषियों से कराने के सिद्धांत का समर्थन कर चुका है। इसलिए जिन व्यक्तियों के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हों, उनसे क्षतिपूर्ति वसूलना और विधि के अनुसार कार्रवाई करना कानून के शासन को मजबूत करेगा। यह प्रतिशोध नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की स्थापना होगी।
एक और गंभीर प्रश्न यह है कि बड़े आंदोलनों में वास्तविक हितधारकों की संख्या कितनी होती है और विभिन्न राजनीतिक, वैचारिक अथवा अन्य संगठित समूह किस सीमा तक उसमें शामिल हो जाते हैं। किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन केवल नारों से नहीं बल्कि उसके नेतृत्व, वित्तीय स्रोतों, संगठनात्मक ढाँचे और वास्तविक उद्देश्य के आधार पर होना चाहिए। यदि किसी आंदोलन में असंबंधित समूह अपनी-अपनी राजनीतिक या वैचारिक मांगें जोड़ने लगें, तो सरकार और जांच एजेंसियों का दायित्व है कि वे तथ्यों के आधार पर पूरे नेटवर्क की जांच करें। यह कार्य पूर्वाग्रह से नहीं बल्कि कानून के अनुसार होना चाहिए।

