7 अक्टूबर के तीन वर्ष: आतंकवाद के बदलते चेहरे और भारत के लिए नई चुनौतियाँ

लेखक: कर्नल (डॉ.) देव आनंद लोहारमरोड़ सुरक्षा एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विद्यार्थी

7 अक्टूबर 2023 इजराइल के इतिहास के सबसे काले दिनों में से एक था। हमास और अन्य सशस्त्र समूहों ने गाजा से दक्षिणी इजराइल पर अभूतपूर्व हमला किया। हजारों रॉकेट दागे गए, सीमा पार घुसपैठ की गई, नागरिकों को निशाना बनाया गया और 251 लोगों को बंधक बना लिया गया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लगभग 1,200 लोग मारे गए। तीन वर्ष बाद 7 अक्टूबर को केवल आतंकवादी हमले की बरसी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह वैश्विक आतंकवाद के बदलते स्वरूप को समझने में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। इस हमले ने दिखाया कि कोई गैर-राज्य सशस्त्र संगठन रणनीतिक आश्चर्य, बड़े पैमाने पर रॉकेट हमलों, घुसपैठ और बंधक बनाने की रणनीति के माध्यम से कहीं अधिक शक्तिशाली राष्ट्र को भी गंभीर रणनीतिक झटका दे सकता है।

इस घटनाक्रम की गहरी सीख यह है कि आधुनिक आतंकवाद विषम युद्धक रणनीति, मनोवैज्ञानिक युद्ध और तकनीक को तेजी से एक साथ जोड़ रहा है। रॉकेटों ने रक्षा प्रणालियों को दबाव में डाला, भौतिक अवरोधों को पार किया गया और बंधक बनाने की कार्रवाई ने भारी मनोवैज्ञानिक एवं राजनीतिक प्रभाव पैदा किया। इसने दिखाया कि तकनीकी श्रेष्ठता तब तक सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती, जब तक खुफिया चेतावनियों को समय पर प्रभावी कार्रवाई में परिवर्तित न किया जाए। आज आतंकवाद का उद्देश्य केवल भौतिक विनाश नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक आघात, राजनीतिक अस्थिरता और वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित करना भी है।

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30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान FZ-1073 में हुई घटना ने विमानन सुरक्षा को लेकर नए सवाल खड़े किए। कप्तान और सह-पायलट के बीच गंभीर कॉकपिट विवाद के बाद विमान की ऊंचाई अचानक कम हुई और उसे सऊदी अरब के तबुक हवाई अड्डे पर आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। घटना के उद्देश्य की गहन जांच आवश्यक है और इसे आतंकवादी हमला कहना अभी जल्दबाजी होगी। हालांकि, यदि विमान को जानबूझकर खतरे में डालने या किसी वैचारिक उद्देश्य को आगे बढ़ाने का इरादा सामने आता है, तो यह नागरिक विमानन के लिए उभरते एकाकी हमलावरों के खतरे की गंभीर चेतावनी हो सकती है।

7 अक्टूबर के बाद इजराइल ने हमास के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया। गाजा में भारी विनाश, विस्थापन और नागरिकों की मौत हुई, जिससे गंभीर मानवीय चिंता उत्पन्न हुई, जबकि हमास के नेतृत्व और सैन्य ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचा। मोहम्मद दीफ, इस्माइल हानिया और याह्या सिनवार मारे गए। सितंबर 2024 में हिजबुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की मौत ने ईरान के व्यापक क्षेत्रीय नेटवर्क को भी बड़ा झटका दिया। इजराइल ने हूती हमलों के जवाब में यमन में भी सैन्य कार्रवाई की। हमास, हिजबुल्लाह और हूती अलग-अलग संगठन हैं, लेकिन उनके वैचारिक एवं रणनीतिक संबंध तथा ईरान से मिलने वाला विभिन्न स्तरों का राजनीतिक, वित्तीय, सैन्य और रसद समर्थन भारत के सुरक्षा आकलन के लिए महत्वपूर्ण है।

चुनौती केवल अलग-अलग आतंकवादी संगठनों तक सीमित नहीं है। आतंकवादी आंदोलन साझा वैचारिक आख्यानों, अंतरराष्ट्रीय संघर्षों, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकते हैं। फिलिस्तीन का मुद्दा पश्चिम एशिया से बाहर भी कट्टरपंथ और लामबंदी के लिए चरमपंथी प्रचार में बार-बार इस्तेमाल किया गया है। 26/11 मुंबई हमले, जिसमें यहूदी चबाड हाउस को भी निशाना बनाया गया था, भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय जिहादी नेटवर्क के इस्तेमाल का स्पष्ट उदाहरण हैं। ऐसे अनुभव बताते हैं कि किसी एक संघर्ष क्षेत्र की घटनाएं हजारों किलोमीटर दूर स्थित सुरक्षा वातावरण को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए भारत को वैध मानवीय चिंता और हिंसक चरमपंथ के समर्थन अथवा उसे बढ़ावा देने के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना होगा।

आतंकवाद अब केवल सीमा पार घुसपैठ और पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं है। डिजिटल प्रचार, आतंकवादी वित्तपोषण, ड्रोन, साइबर क्षमताएं, स्थानीय स्तर पर कट्टरपंथ और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले ने खतरे के नए आयाम पैदा कर दिए हैं। इंटरनेट एक प्रभावी गुणक बन चुका है, जिसके माध्यम से चरमपंथी नेटवर्क सीमाओं के पार भर्ती, प्रभाव और समन्वय कर सकते हैं। व्यावसायिक ड्रोन, सस्ती डिजिटल तकनीक और एन्क्रिप्टेड संचार पारंपरिक सुरक्षा और खुफिया तंत्र के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।

भारत के लिए पाकिस्तान-आधारित आतंकवादी पारिस्थितिकी तंत्र विशेष रूप से गंभीर चिंता का विषय है। पश्चिमी सीमा के पार सक्रिय अथवा समर्थन और सुरक्षित ठिकाने प्राप्त करने वाले संगठन लगातार खतरा बने हुए हैं। चुनौती केवल अलग-अलग हमलों का जवाब देना नहीं है, बल्कि उन नेटवर्कों, मददगारों, वित्तीय चैनलों और बुनियादी ढांचे की पहचान करना है, जो ऐसे हमलों को संभव बनाते हैं। भारत की सुरक्षा रणनीति का केंद्र इन तंत्रों को हिंसा में बदलने से पहले ही बाधित करना होना चाहिए।

22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकवादी हमले में 26 निर्दोष लोगों की हत्या ने भारत को आतंकवाद की भारी कीमत का एक और उदाहरण दिया। 7 मई 2025 को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर सटीक कार्रवाई की। लेकिन भविष्य की रणनीति केवल जवाबी कार्रवाई पर निर्भर नहीं रह सकती। लक्ष्य यह होना चाहिए कि आतंकवादी नेटवर्क हमला करने से पहले ही निष्क्रिय कर दिए जाएं।

भारत की आतंकवाद-रोधी नीति को प्रतिक्रियात्मक मॉडल से आगे बढ़ाकर पूर्वानुमान आधारित, निवारक और नेटवर्क-केंद्रित सुरक्षा सिद्धांत में बदलना होगा। मानवीय, तकनीकी, उपग्रह, साइबर, वित्तीय और खुले स्रोतों से प्राप्त खुफिया जानकारी को एक साझा राष्ट्रीय खतरा-चित्र में एकीकृत किया जाना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण का उपयोग संदिग्ध पैटर्न, सीमा-पार गतिविधियों, डिजिटल कट्टरपंथ और वित्तीय प्रवाह की शुरुआती पहचान के लिए किया जा सकता है। लक्ष्य केवल हमलावर को पकड़ना नहीं, बल्कि हमले से पहले उसकी योजना, नेटवर्क और समर्थन तंत्र को निष्क्रिय करना होना चाहिए।

सीमा सुरक्षा को निगरानी से आगे बढ़ाकर रोकथाम आधारित सुरक्षा ढांचे में बदलना होगा। नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर निरंतर निगरानी, सेंसर नेटवर्क, मानवरहित हवाई प्रणालियां, ड्रोन-रोधी क्षमताएं, सुरक्षित संचार और त्वरित प्रतिक्रिया इकाइयों को एकीकृत करना होगा। साथ ही, आतंकवाद के वित्तीय और डिजिटल आधार पर भी व्यवस्थित कार्रवाई आवश्यक है। हवाला नेटवर्क, अवैध धन हस्तांतरण, मुखौटा संगठन, क्रिप्टोकरेंसी चैनल, हथियारों की खरीद और ऑनलाइन भर्ती तंत्र की पहचान कर उन्हें बाधित करना होगा।

भारत को एक मजबूत संपूर्ण सरकार और संपूर्ण राष्ट्र आधारित सुरक्षा ढांचे की आवश्यकता है। खुफिया एजेंसियों, सशस्त्र बलों, केंद्रीय एवं राज्य पुलिस, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, वित्तीय नियामकों, विमानन एवं समुद्री सुरक्षा एजेंसियों तथा राजनयिक संस्थानों को साझा खतरा आकलन और परस्पर सक्षम सूचना प्रणालियों के माध्यम से काम करना चाहिए। नियमित बहु-एजेंसी अभ्यासों में ड्रोन हमले, साइबर व्यवधान, बंधक संकट, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले और एकाकी हमलावरों जैसे बहु-क्षेत्रीय परिदृश्यों की तैयारी को परखा जाना चाहिए।

इस रणनीति का परिचालन ढांचा स्पष्ट होना चाहिए: पहचानें, बाधित करें, ध्वस्त करें और वंचित करें—Detect, Disrupt, Dismantle and Deny। खतरे की समय रहते पहचान करें, हमले की योजना को बाधित करें, पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करें और आतंकवादियों को दोबारा हमला करने की क्षमता तथा अवसर से वंचित करें। यही दृष्टिकोण भारत को प्रतिक्रियात्मक सुरक्षा से सक्रिय और पूर्व-निवारक आतंकवाद-रोधी रणनीति की ओर ले जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी इस रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ होना चाहिए। भारत को खुफिया जानकारी साझा करने, आतंकवादी वित्तपोषण रोकने, प्रत्यर्पण और आतंकवादी सुरक्षित ठिकानों तथा उनके प्रायोजकों के खिलाफ समन्वित कार्रवाई को मजबूत करना चाहिए। कूटनीति के माध्यम से आतंकवाद को राजनीतिक, वित्तीय या रसद सहायता देने वालों को उजागर और अलग-थलग किया जाना चाहिए।

अंततः भारत की प्रतिरोधक क्षमता विश्वसनीय बनी रहनी चाहिए। ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की निर्णायक जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति को प्रदर्शित किया। हालांकि, अंतिम उद्देश्य लगातार जवाबी कार्रवाई करना नहीं, बल्कि रणनीतिक रोकथाम होना चाहिए। 7 अक्टूबर के बाद के दौर की केंद्रीय सीख स्पष्ट है: आतंकवाद को केवल युद्धक्षेत्र में नहीं, बल्कि खुफिया नेटवर्क, वित्तीय प्रणालियों, साइबर क्षेत्र, सूचना तंत्र और उस वैचारिक पारिस्थितिकी तंत्र में भी पराजित करना होगा, जो उसे बनाए रखता है।

भारत को केवल खतरों का जवाब देने के बजाय उनका पूर्वानुमान लगाना होगा। अंतिम सिद्धांत सरल होना चाहिए: हमले को रोकें, नेटवर्क को ध्वस्त करें, सुरक्षित ठिकानों को समाप्त करें—और जहां रोकथाम संभव हो, वहां एक और ऑपरेशन सिंदूर की आवश्यकता ही न पड़े। Priyanka Mali state head Rajasthan