मैं प्रतिदिन अज्ञानता दूर करता हूँ (I-DID): समाचार-पत्र पढ़ने की आदत...
लेखिका: डॉ. नेहा लोहमरोड़, संस्थापक एवं निदेशक, कोश फाउंडेशन
19वीं शताब्दी के दार्शनिक जॉन ड्यूई का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी एकत्र करना नहीं, बल्कि व्यक्तियों को समाज में विचारशील और जागरूक भागीदारी के लिए तैयार करना होना चाहिए। आज के दौर में भी यह विचार उतना ही प्रासंगिक है, जब बच्चे डिजिटल सामग्री से घिरे रहते हैं, लेकिन अक्सर उनके पास पढ़ी गई बातों पर विचार करने और सवाल उठाने का पर्याप्त समय नहीं होता। प्रतिदिन पढ़ने की आदत, विशेष रूप से समाचार-पत्र पढ़ना, बच्चों को जागरूक, अभिव्यक्तिशील, जिज्ञासु और आलोचनात्मक चिंतन करने वाला बना सकता है। समाचार-पत्र केवल समसामयिक घटनाओं की जानकारी देने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी कक्षा है, जो बच्चों को उनके आसपास की दुनिया से जोड़ती है और साथ ही उन्हें भीतर से अधिक विचारशील बनाती है।
मस्तिष्क की लचीलापन क्षमता: सीखने के लिए मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना...
नियमित रूप से पढ़ने के सबसे महत्त्वपूर्ण लाभों में से एक इसका मस्तिष्क की लचीलापन क्षमता (न्यूरोप्लास्टिसिटी) से संबंध है। यह मस्तिष्क की वह क्षमता है, जिसके माध्यम से सीखने और अनुभवों के अनुसार उसकी संरचना तथा तंत्रिका-कोशिकाओं के बीच संबंधों में परिवर्तन हो सकता है। मस्तिष्क कोई ऐसी स्थिर संरचना नहीं है, जिसका विकास बचपन के शुरुआती वर्षों के बाद रुक जाता हो। जीवनभर सीखने की प्रक्रिया मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों के बीच संचार के तरीकों को प्रभावित कर सकती है, हालाँकि बचपन और किशोरावस्था विकास के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं।
जब कोई बच्चा पढ़ता है, तो उसका मस्तिष्क एक साथ कई प्रक्रियाओं का समन्वय करता है। आँखें लिखे हुए अक्षरों और प्रतीकों को पहचानती हैं, मस्तिष्क अक्षरों को ध्वनियों से जोड़ता है, भाषा से संबंधित प्रणालियाँ शब्दों और वाक्यों का अर्थ समझने में सहायता करती हैं, स्मृति पहले पढ़ी गई जानकारी को याद रखने में मदद करती है और तर्कशक्ति निष्कर्ष निकालने में सहायक होती है। नियमित अभ्यास से ये प्रक्रियाएँ अधिक प्रभावी हो जाती हैं और उनके बीच बेहतर समन्वय स्थापित होता है।
प्रसिद्ध तंत्रिका-विज्ञानी स्टैनिस्लास देहाने ने अपनी पुस्तक रीडिंग इन द ब्रेन: द न्यू साइंस ऑफ हाउ वी रीड में बताया है कि पढ़ना सीखने की प्रक्रिया मस्तिष्क की पहले से मौजूद प्रणालियों को पुनर्गठित करती है, जिससे वे पढ़ने के नए कौशल को विकसित करने में सक्षम बनती हैं। देहाने और उनके सहयोगियों द्वारा समीक्षा किए गए शोध से पता चला है कि साक्षरता मस्तिष्क में लिखित भाषा के प्रति प्रतिक्रिया को बदलती है तथा दृश्य पहचान और भाषा-प्रसंस्करण से संबंधित प्रणालियों के बीच संबंधों को मजबूत करती है।
समाचार-पत्र पढ़ना इस प्रक्रिया को और समृद्ध कर सकता है, क्योंकि इसकी सामग्री प्रतिदिन बदलती रहती है। एक दिन बच्चा किसी वैज्ञानिक खोज के बारे में पढ़ सकता है, अगले दिन उसे किसी ऐतिहासिक घटना का संदर्भ मिल सकता है और उसके बाद वह किसी सामाजिक मुद्दे से परिचित हो सकता है। प्रत्येक विषय नई शब्दावली और अवधारणाओं से परिचित कराता है तथा बच्चे को नई जानकारी को अपने पूर्व ज्ञान से जोड़ने के लिए प्रेरित करता है।
जब बच्चे समाचारों की तुलना करते हैं, प्रश्न पूछते हैं और पढ़ी गई सामग्री का सार अपने शब्दों में प्रस्तुत करते हैं, तो वे केवल शब्दों को पहचानने का अभ्यास नहीं करते, बल्कि अपनी एकाग्रता, स्मरण शक्ति, समझ और तर्कशक्ति का भी उपयोग करते हैं। इसके लाभ केवल छोटे बच्चों तक सीमित नहीं हैं। मस्तिष्क जीवनभर सीखने में सक्षम रहता है और पढ़ने की आदत किसी भी उम्र में ज्ञान तथा भाषा संबंधी कौशल विकसित कर सकती है। इसलिए आवश्यक है कि बच्चों को नियमित रूप से उनकी उम्र और समझ के अनुरूप पढ़ने की सामग्री मिले और उन्हें उस सामग्री पर सार्थक विचार-विमर्श करने के अवसर भी प्रदान किए जाएँ।
