स्टेट ब्यूरो प्रियंका माली की रिपोर्ट

कश्मीर में भारतीय सेना एवं गुर्जर-बकरवाल समुदाय की देशभक्ति, बलिदान और आतंकवाद विरोधी संघर्ष की अमर गाथा….

​लेखक: कर्नल देव आनंद लोहमरोड़

(सुरक्षा एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ)

​आज से ठीक 23 वर्ष पूर्व, 27 मई 2003 के ऐतिहासिक दिन भारतीय सेना द्वारा जम्मू-कश्मीर के पुंछ-राजौरी क्षेत्र में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के विरुद्ध चलाए गए 'ऑपरेशन सर्प विनाश' की सफलता का आधिकारिक उद्घोष किया गया था। यह केवल एक सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि भारतीय सैन्य इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय था जहां देश की सेना और स्थानीय गुर्जर-बकरवाल समुदाय के जांबाजों ने मिलकर हिल काका जैसे अभेद्य और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में आतंकवाद का समूल सर्वनाश किया था। 'मिनी कारगिल' कहे जाने वाले इस क्षेत्र से उग्रवाद के इस सफाए ने साबित कर दिया कि जब 'जवान और आवाम' एक साथ खड़े हो जाएं, तो दुनिया की कोई भी आतंकी ताकत भारत की संप्रभुता को चुनौती नहीं दे सकती।

​कश्मीर घाटी की चर्चा होते ही अधिकांश लोगों के मन में आतंकवाद, सैन्य अभियान, सीमा पार घुसपैठ और राजनीतिक अस्थिरता की तस्वीर उभरती है। दशकों से यह क्षेत्र उग्रवाद का केंद्र बना रहा है। किंतु इस समूचे विमर्श की छाया में एक ऐसा समुदाय भी है जिसने बिना किसी बड़े प्रचार, बिना किसी विशेष सरकारी सम्मान और कई बार अपनी जान जोखिम में डालकर राष्ट्र की रक्षा में अभूपूर्व योगदान दिया है। यह समुदाय है गुर्जर-बकरवाल समाज—एक ऐसा समाज जिसकी कहानी केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि अटूट देशभक्ति, साहस और बलिदान की भी कहानी है।

​जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्रों में सदियों से निवास करने वाला गुर्जर-बकरवाल समुदाय मुख्यतः घुमंतू पशुपालक समाज है। भेड़-बकरियों और पशुधन के साथ मौसम के अनुसार ऊँचाई बदलते हुए प्रवास करना, जंगलों और पहाड़ी दर्रों से गुजरना तथा प्रकृति की कठोर परिस्थितियों को जीवन का हिस्सा मानना उनकी जीवनशैली का अभिन्न भाग रहा है। यही जीवनशैली उन्हें उन दुर्गम इलाकों की ऐसी गहरी समझ देती है, जो सामान्य लोगों और कई बार बाहरी सुरक्षा तंत्र के लिए भी चुनौतीपूर्ण होते हैं। यही कारण है कि आतंकवाद प्रभावित कश्मीर में यह समुदाय केवल सामाजिक अस्तित्व भर नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का एक मौन लेकिन प्रभावशाली प्रहरी भी सिद्ध हुआ है।

​1947 के बाद जम्मू-कश्मीर में बने संघर्षपूर्ण हालात और भारत-पाकिस्तान के बीच बनी सीजफायर लाइन पर गुर्जर-बकरवाल समुदाय भारतीय सुरक्षा बलों के साथ अग्रिम चौकियों पर दशकों तक पोर्टर, गाइड और स्थानीय सहयोगी के रूप में खड़ा रहा। सीमित संसाधनों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में सेना के लिए उनका सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण था। 1990 के दशक में जब घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों में आतंकवाद ने संगठित रूप लिया, तब यह समुदाय स्वयं भी आतंकवाद की हिंसा का शिकार बना। आतंकवादियों ने जंगलों और पर्वतीय इलाकों को अपने सुरक्षित ठिकानों में बदलने का प्रयास किया और स्थानीय समर्थन प्राप्त करने की कोशिश की। लेकिन गुर्जर-बकरवाल समाज ने आतंकवादियों के समक्ष समर्पण करने से इनकार कर दिया।

​इसके परिणाम उन्हें भुगतने पड़े। अनेक स्थानों पर उनके घरों को जलाया गया, पशुधन लूटा गया, परिवारों को धमकियाँ दी गईं और कई निर्दोष लोगों की जान गई। फिर भी यह समाज आतंकवादियों के सामने नहीं झुका। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि उनकी धरती आतंकवाद का आश्रय नहीं बनेगी।