फिरौती का जाल: ईरान, सऊदी अरब और शांति की खतरनाक कीमत... लेखक: कर्नल (डॉ.) देव आनंद लोहामरोड़...
मध्य-पूर्व के हालिया घटनाक्रम ने सऊदी अरब, पाकिस्तान, तुर्की और ईरान की रणनीतिक प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। एक ओर सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का में पारस्परिक रक्षा समझौते के माध्यम से सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करने का प्रयास किया है, तो दूसरी ओर क्षेत्रीय तनाव ने इन देशों को ईरान के साथ बातचीत की मेज तक पहुँचाया है। यदि हूती हमलों से राहत पाने के लिए सऊदी अरब आर्थिक रियायतें देने की पेशकश करता है, जैसा कि कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है, तो एक बुनियादी सवाल उठता है: क्या धमकी देने वालों को भुगतान करके शांति हासिल की जा सकती है, या ऐसा दृष्टिकोण भविष्य में और अधिक दबाव तथा हिंसा को प्रोत्साहित करने का जोखिम पैदा करता है?
7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस व्यवस्था की तुलना NATO की सामूहिक रक्षा की अवधारणा से की जा रही है और कुछ लोग इसे ‘इस्लामिक NATO’ भी कह रहे हैं। हालाँकि, किसी गठबंधन की शक्ति उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक सैन्य क्षमताओं, सदस्य देशों की प्रतिबद्धताओं और संकट के समय उनके व्यवहार से तय होती है। इसकी विश्वसनीयता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या यह आक्रामकता को रोक सकता है और खतरा उत्पन्न होने पर अपने सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।
26 अक्टूबर 2026 को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने तेहरान में ईरानी अधिकारियों के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा की। प्रकाश में आए विवरणों के अनुसार, इसमें सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और तुर्की की खुफिया एजेंसी के प्रमुख इब्राहिम कलीन शामिल थे। ईरान की ओर से राष्ट्रपति मसूद पजेश्कियन और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की भागीदारी की भी खबरें आईं। यदि इन विवरणों की पुष्टि होती है, तो यह स्पष्ट होगा कि अलग-अलग सुरक्षा व्यवस्थाओं के बावजूद संबंधित देश ईरान के साथ संवाद को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। कूटनीति कमजोरी का संकेत नहीं है, लेकिन उसकी सफलता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि क्या उससे हिंसा में वास्तविक कमी आती है और स्थायी सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त होता है।
यमन का हूती आंदोलन क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। उसके मिसाइल और ड्रोन हमलों ने जहाजरानी के लिए खतरे बढ़ाए हैं और लाल सागर में असुरक्षा की स्थिति पैदा की है। हूतियों के साथ ईरान के संबंधों ने इस संकट को और जटिल बना दिया है। ईरान पर हूतियों को सहायता देने के आरोप बार-बार लगाए जाते रहे हैं। ऐसे में मुख्य प्रश्न यह है कि क्या ईरान अपने प्रभाव का इस्तेमाल हमले रोकने और स्थायी समाधान की दिशा में करने के लिए तैयार है? यदि किसी देश का प्रभाव ऐसे सशस्त्र समूह पर है, जो पड़ोसी देशों पर हमले करता है, तो सार्थक कूटनीति में हिंसा रोकने के व्यावहारिक प्रयास भी शामिल होने चाहिए। 27 अक्टूबर 2026 को कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि सऊदी अरब ने हूती हमले रुकवाने के लिए एक अरब डॉलर के वित्तीय पैकेज की पेशकश की थी और इसमें ईरान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था। स्वतंत्र पुष्टि के अभाव में इस पेशकश को स्थापित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी, यह दावा एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक प्रश्न उठाता है: जब सुरक्षा की कीमत के रूप में धन की माँग सामने आती है, तो उसके परिणाम क्या हो सकते हैं? युद्धविराम समझौते के अंतर्गत मानवीय सहायता, पुनर्निर्माण और आर्थिक सहयोग वैध रूप से शामिल किए जा सकते हैं। चिंता तब पैदा होती है, जब ऐसा प्रतीत हो कि धमकियों के दबाव में रियायतें हासिल की जा रही हैं और हमले रोकने की कोई विश्वसनीय गारंटी मौजूद नहीं है। ऐसी व्यवस्था तत्काल राहत तो दे सकती है, लेकिन भविष्य में दोबारा दबाव बनाने के लिए प्रोत्साहन भी पैदा कर सकती है।
यही ‘फिरौती का जाल’ है। इतिहास गवाह है कि गैर-राज्य अभिनेताओं को वित्तीय रियायतें देना कभी स्थायी समाधान नहीं लाता। यदि धमकियों के परिणामस्वरूप आर्थिक लाभ मिलने लगे, तो सशस्त्र समूह यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हिंसा उनकी माँगें मनवाने का प्रभावी साधन है। दूसरे पक्ष भी इससे यही सबक ले सकते हैं, जिससे भविष्य के संकटों का समाधान और कठिन हो सकता है। अत्यंत विषम परिस्थितियों में तत्काल हिंसा रोकने के लिए वित्तीय सहयोग पर विचार किया जा सकता है, लेकिन इसे विश्वसनीय सुरक्षा व्यवस्था, जवाबदेही और स्थायी राजनीतिक समाधान का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए। इसलिए शांति स्थापित करने में सहयोग देने और दबाव या हिंसा को पुरस्कृत करने के बीच अंतर करना आवश्यक है।
सऊदी अरब की चिंताएँ स्वाभाविक हैं। उसे अपने नागरिकों, क्षेत्र, ऊर्जा ढाँचे, तेल निर्यात और आर्थिक स्थिरता की रक्षा करनी है। दूसरी ओर, ईरान के अपने क्षेत्रीय हित और सुरक्षा संबंधी प्राथमिकताएँ हैं। पाकिस्तान इस समझौते के माध्यम से मुस्लिम जगत में अपनी रणनीतिक भूमिका मजबूत करना चाह सकता है, जबकि NATO का सदस्य तुर्की मध्य-पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। फिर भी, इन देशों के उद्देश्य प्रत्येक मुद्दे पर एक समान नहीं हैं। रक्षा समझौते में भागीदारी का अर्थ यह भी नहीं है कि प्रत्येक सदस्य हूतियों के विरुद्ध किसी सैन्य अभियान में शामिल होगा। घोषित प्रतिबद्धताओं और वास्तविक सैन्य कार्रवाई के बीच अंतर होता है। इस व्यवस्था का वास्तविक महत्त्व इस बात से तय होगा कि उसके सदस्य क्या करने के लिए तैयार हैं और वास्तव में क्या कर पाते हैं।
इस संकट के आर्थिक परिणाम भी व्यापक हैं। स्वेज नहर भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है, जबकि बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण मार्ग है। इन जलमार्गों में असुरक्षा बढ़ने से जहाजों को लंबे रास्ते अपनाने पड़ सकते हैं, परिवहन और बीमा की लागत बढ़ सकती है तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ प्रभावित हो सकती हैं। मिस्र के लिए स्वेज नहर से होने वाली आय महत्त्वपूर्ण है, जबकि सऊदी अरब को अपने ऊर्जा निर्यात की सुरक्षा करनी है। तुर्की के व्यापारिक हित हैं और पाकिस्तान को अपनी रणनीतिक साझेदारियों के साथ आर्थिक हितों का भी संतुलन बनाना है। इस प्रकार क्षेत्रीय या धार्मिक एकता की घोषणाओं के पीछे प्रत्येक देश के अपने राष्ट्रीय हित भी काम करते हैं।
भारत के लिए भी इन घटनाक्रमों का रणनीतिक महत्त्व है। लाल सागर में असुरक्षा से भारतीय व्यापार पर ढुलाई और बीमा लागत का भारी दबाव पड़ता है। यदि कोई वैध और व्यावहारिक व्यवस्था भारत को अनुकूल शर्तों पर ऊर्जा संसाधन प्राप्त करने का अवसर देती है, तो इससे लाभ हो सकता है। हालाँकि, भारत को प्रतिबंधों, समुद्री सुरक्षा और दीर्घकालीन हितों पर भी विचार करना होगा। यहाँ एक और बुनियादी प्रश्न उठता है: यदि सशस्त्र समूहों के आगे झुककर या उन्हें वित्तीय रियायतें देकर शांति खरीदी जाती है, तो यह नीति प्रॉक्सी युद्ध और सीमा-पार आतंकवाद को एक रणनीतिक हथियार के रूप में बढ़ावा देगी। इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा अवधारणा पर भी पड़ेगा। इसलिए भारत को अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और आतंकवाद तथा प्रॉक्सी युद्ध के विरोध—दोनों को ध्यान में रखकर नीति बनानी चाहिए।
अंततः, सऊदी अरब, ईरान और हूतियों से जुड़ा यह घटनाक्रम एक व्यापक प्रश्न खड़ा करता है: क्या सुरक्षा विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता, अंतरराष्ट्रीय कानून और जवाबदेही के आधार पर सुनिश्चित होगी, या फिर धमकियों के बाद भुगतान और उसके बाद कुछ समय के लिए शांति का चक्र चलता रहेगा? यदि सऊदी अरब द्वारा एक अरब डॉलर की पेशकश की स्वतंत्र पुष्टि होती है, तो उसकी परिस्थितियों और शर्तों की सावधानीपूर्वक जाँच आवश्यक होगी। किसी भी समझौते का उद्देश्य नागरिकों की रक्षा करना, देशों की संप्रभुता का सम्मान करना और भविष्य में हमलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए विश्वसनीय व्यवस्था तैयार करना होना चाहिए। ईरान सहित क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले देशों को इस प्रभाव का उपयोग तनाव बढ़ाने के बजाय तनाव कम करने और स्थायी शांति को प्रोत्साहित करने के लिए करना चाहिए। शांति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कुछ समय के लिए हमले रुक गए। यह भी देखना होगा कि क्या हिंसा के मूल कारणों का समाधान हुआ है और क्या भविष्य में दोबारा हमले होने की आशंका कम हुई है। आर्थिक सहायता पुनर्निर्माण या पारस्परिक सहमति से हुए शांति समझौते का वैध हिस्सा हो सकती है, लेकिन जब वह दबाव और हिंसा को पुरस्कृत करती हुई दिखाई दे, तो वह रणनीतिक रूप से खतरनाक बन जाती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित करनी चाहिए, जिनमें कूटनीति हिंसा के प्रोत्साहनों को कम करे, न कि सुरक्षा को एक बार-बार होने वाला आर्थिक लेन-देन बना दे। वास्तविक चुनौती केवल कुछ समय के लिए संघर्ष रोकने की कीमत चुकाना नहीं, बल्कि ऐसी स्थायी शांति स्थापित करना है जिसे बार-बार खरीदना न पड़े।
