*सरकार किसकी सुन रही है? मंत्री अधिकारियों से परेशान, अधिकारी कर्मचारियों से और जनता सबके बीच हलाकान!*

भोपाल की बैठकों से लेकर रीवा के निलंबन तक उठते सवाल—क्या सरकारी आदेशों की ताकत फाइलों तक सिमट गई है?

विशेष टिप्पणी | दीपक तिवारी news 24 ×7 india

मध्य प्रदेश में सरकार चल रही है, मंत्रालय चल रहा है, बैठकें हो रही हैं, आदेश जारी हो रहे हैं, धरने-प्रदर्शन भी चल रहे हैं और कार्रवाई की चेतावनियां भी दी जा रही हैं। लेकिन इस पूरी प्रशासनिक कवायद के बीच एक बुनियादी सवाल लगातार सिर उठा रहा है—क्या सरकार के आदेशों का जमीन पर उतना ही असर है, जितना बैठकों में सुनाई देता है?

अगर हालिया घटनाक्रमों को एक साथ रखकर देखा जाए, तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों से लेकर गांवों में तैनात कर्मचारियों तक, हर स्तर पर असंतोष और टकराव की खबरें सामने आ रही हैं। कहीं मंत्री अधिकारियों की कार्यशैली से असंतुष्ट हैं, कहीं कर्मचारी सरकार की नीतियों से, तो कहीं प्रशासनिक अधिकारी अपने अधीनस्थों से काम नहीं करवा पाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं। इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जनता की समस्याओं का समाधान कौन करेगा?

*जब मंत्रियों की शिकायतें ही व्यवस्था पर सवाल उठाने लगें*

हाल ही में भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक बैठक को लेकर सामने आई चर्चाओं में अलग-अलग मंत्रियों की शिकायतों की बात कही गई। उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला की ओर से अधिकारियों द्वारा बात नहीं सुने जाने की शिकायत का जिक्र हुआ। वहीं, छिंदवाड़ा में कथित तौर पर जहरीले सिरप से बच्चों की मौत के मामले को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और संबंधित विभाग की जवाबदेही पर सवाल उठने की चर्चाएं भी सामने आईं। कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद पटेल की शिकायतों का भी उल्लेख किया गया।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बंद कमरे में हुई बैठकों की चर्चाओं और आधिकारिक रूप से पुष्ट बयानों में अंतर होता है। फिर भी, यदि सरकार के भीतर ही समन्वय और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर असंतोष है, तो यह आत्ममंथन का विषय जरूर है।

आखिर मंत्री सरकार की नीतियों को लागू कराने के लिए जिम्मेदार हैं और अधिकारी उन नीतियों को जमीन तक पहुंचाने के लिए। जब इन दोनों के बीच तालमेल पर सवाल उठने लगें, तो उसका असर अंततः आम नागरिक पर ही पड़ता है।

सवाल यह नहीं कि किस मंत्री की किस अधिकारी से नहीं बनी; सवाल यह है कि शासन की मशीनरी में तालमेल की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

*मुख्यमंत्री से पटवारी तक—आदेशों की अपनी-अपनी दुनिया!*

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार नीतियां बनाती है, प्रशासन उन्हें लागू करता है और कर्मचारी जनता तक उनका लाभ पहुंचाते हैं। लेकिन जब सरकारी योजनाएं कर्मचारियों के विरोध के कारण अटकने लगें, तो शासन की कार्यक्षमता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

स्वामित्व योजना के तहत संपत्ति संबंधी अभिलेखों और रजिस्ट्री की प्रक्रिया को लेकर जारी गतिरोध इसका एक उदाहरण बनकर सामने आया है। यदि पटवारी अपनी मांगों पर अड़े हैं और कामकाज प्रभावित हो रहा है, तो इसका सीधा असर उन नागरिकों पर पड़ता है, जिन्हें अपनी जमीन और संपत्ति से जुड़े काम पूरे कराने हैं।

सरकार का पक्ष भी सुना जाना चाहिए और कर्मचारियों की मांगों पर भी नियमानुसार विचार होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि जब किसी योजना को लागू करने के लिए आदेश पर आदेश जारी किए जा रहे हों, तब भी जमीन पर अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं दिखाई देते?