शौर्य दिवस: क्या राष्ट्र केवल अपने शहीदों को याद ही करेगा, या उनके परिवारों को अधिकार भी देगा ?
27 अक्टूबर: शौर्य, बलिदान और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का दिन..
लेखक: कर्नल (डॉ.) देव आनंद लोहमरोड़
27 अक्टूबर जम्मू-कश्मीर और पूरे भारत के लिए ऐतिहासिक महत्व का दिन है। कोई इसे शौर्य दिवस कहता है, कोई जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय दिवस मानता है, जबकि भारतीय सेना इसे पैदल सेना दिवस के रूप में मनाती है। नाम चाहे जो हो, इस दिन का वास्तविक महत्व उन सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान में निहित है, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। लेकिन आज इस अवसर पर एक मूलभूत प्रश्न उठता है—क्या राष्ट्र की जिम्मेदारी केवल अपने शहीदों को याद करने तक सीमित है, या उनके परिवारों को सम्मान, सुरक्षा और अधिकार देना भी उसका कर्तव्य है?
अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों ने जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण किया। महाराजा हरि सिंह के सामने गंभीर संकट था। हमलावर तेजी से आगे बढ़ रहे थे और निर्दोष नागरिकों पर अत्याचार हो रहे थे। श्रीनगर पर खतरा मंडरा रहा था। ऐसी परिस्थितियों में महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसे अगले दिन स्वीकार किया गया। 27 अक्टूबर को सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन के सैनिक डकोटा विमानों से श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरे। उनका उद्देश्य हमलावरों को रोकना और श्रीनगर सहित जम्मू-कश्मीर की रक्षा करना था। कठिन परिस्थितियों में इन सैनिकों ने असाधारण साहस का परिचय दिया और इतिहास की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ। वर्ष 1947-48 के युद्ध से लेकर 1965 और 1971 के युद्धों, 1999 के कारगिल युद्ध तथा दशकों तक चले आतंकवाद-रोधी अभियानों में भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। दुर्गम पहाड़ों, बर्फीली चोटियों और खतरनाक क्षेत्रों में तैनात जवानों ने देश की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा की। उनके बलिदान जम्मू-कश्मीर के इतिहास का अभिन्न अंग हैं।
लेकिन हर वर्ष हम समारोह आयोजित करते हैं, स्मारकों पर माल्यार्पण करते हैं, शॉल भेंट करते हैं, भाषण देते हैं और सैनिकों तथा उनके परिवारों के साथ तस्वीरें खिंचवाकर सामाजिक माध्यमों पर साझा करते हैं। इन परंपराओं का अपना महत्व है, लेकिन क्या इतना करना पर्याप्त है? क्या शहीद की माता को शॉल भेंट करने से उसकी आर्थिक समस्याएं समाप्त हो जाती हैं? क्या वीर नारी को सम्मान-पत्र देने से उसके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाता है? क्या औपचारिक सम्मान वास्तविक अधिकारों और सहायता का विकल्प बन सकता है?
शहीद की माता के लिए उसका बेटा केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि उसके जीवन का सहारा और बुढ़ापे की आशा होता है। इसी तरह, सैनिक की पत्नी को अपने जीवनसाथी को खोने के बाद बच्चों के पालन-पोषण और परिवार की जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती हैं। ऐसे परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन की आवश्यकता होती है। इन जरूरतों को भाषणों और समारोहों से पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए स्पष्ट कानून, संवेदनशील प्रशासन और समयबद्ध सहायता आवश्यक है।
राजस्थान ने इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। राज्य सरकार ने 2022 में युद्ध अथवा रक्षा अभियानों में वीरगति प्राप्त करने वाले सशस्त्र बलों के पात्र आश्रितों को सरकारी नियुक्ति देने से संबंधित विशेष प्रावधान अधिसूचित किए। ये नियुक्तियां निर्धारित पात्रता और नियमों के अधीन हैं, लेकिन यह पहल दर्शाती है कि सैनिक के बलिदान को उसके परिवार के पुनर्वास और अधिकारों से जोड़ने के लिए ठोस व्यवस्था बनाई जा सकती है।
यदि राजस्थान ऐसा कदम उठा सकता है, तो अन्य राज्य ऐसा क्यों नहीं कर सकते? क्या भारत सरकार को एक व्यापक राष्ट्रीय कानून नहीं बनाना चाहिए, जिसके अंतर्गत पात्र शहीद-आश्रितों को योग्यता और निर्धारित नियमों के अनुसार सरकारी रोजगार का अवसर मिले? इसके साथ पेंशन, आर्थिक सहायता, स्वास्थ्य सुविधाएं, बच्चों की शिक्षा और दीर्घकालीन पुनर्वास सुनिश्चित किया जाना चाहिए। सरकारी सहायता केवल घोषणाओं तक सीमित न रहे, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था के माध्यम से समय पर परिवारों तक पहुंचे।
यह प्रश्न जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। जिस धरती की रक्षा के लिए हजारों सैनिकों ने अपने प्राण न्योछावर किए, वहां के प्रशासन और समाज की भी उनके परिवारों के प्रति जिम्मेदारी बनती है। भारत सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन मिलकर ऐसी नीति क्यों नहीं बना सकते, जिसके अंतर्गत पात्र शहीद परिवारों को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास संबंधी सहायता में उचित प्राथमिकता मिले? लागू कानूनों और पात्रता के अधीन आवासीय भूखंड या भूमि आवंटन की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है। जहां भूमि देना संभव न हो, वहां सुरक्षित आवास अथवा वैकल्पिक पुनर्वास सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है।
ये मांगें किसी प्रकार की दया या एहसान के लिए नहीं हैं। ये राष्ट्रीय कृतज्ञता, न्याय और संस्थागत जिम्मेदारी से जुड़े प्रश्न हैं। किसी क्षेत्र की रक्षा करते हुए बलिदान देने वाले सैनिक के परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करना पूरे राष्ट्र का दायित्व है।
इसका अर्थ जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को दोषी ठहराना नहीं है। वहां के अनेक नागरिकों ने भी आतंकवाद और हिंसा का दंश झेला है, अपने प्रियजनों को खोया है और कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया है। कई स्थानीय नागरिकों ने सुरक्षा बलों की सहायता भी की है। इसलिए यह प्रश्न किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि सरकारों, संस्थाओं और समाज की साझा जिम्मेदारी के बारे में है। संकट के समय साहस दिखाने वाले स्थानीय नागरिकों के योगदान को भी प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेजों के माध्यम से सामने लाया जाना चाहिए।
इस शौर्य दिवस पर केंद्र सरकार, जम्मू-कश्मीर प्रशासन और सभी राज्य सरकारों को शहीद परिवारों के कल्याण से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा करनी चाहिए। प्रत्येक पात्र परिवार के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी नियुक्त हो। लंबित पेंशन, मुआवजे और नियुक्तियों के मामलों का समयबद्ध निस्तारण हो। बच्चों की शिक्षा प्रशासनिक देरी के कारण बाधित न हो, वीर नारियों को कानूनी सहायता मिले और वृद्ध माता-पिता की जरूरतों की उपेक्षा न की जाए। शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए, ताकि परिवारों को अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए बार-बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।
मैं भारत सरकार, सभी राज्य सरकारों, राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से आग्रह करता हूं कि शौर्य दिवस को एक नए राष्ट्रीय संकल्प का अवसर बनाएं। राजस्थान की पहल का अध्ययन कर अन्य राज्यों में उपयुक्त प्रावधान लागू किए जाएं और पात्र शहीद परिवारों के लिए देशव्यापी सुरक्षा व्यवस्था विकसित की जाए।
किसी शहीद की माता को अपने अधिकारों के लिए वर्षों तक संघर्ष न करना पड़े। किसी वीर नारी को सहायता पाने के लिए अपनी पीड़ा सार्वजनिक करने को विवश न होना पड़े। किसी शहीद के बच्चे का भविष्य प्रशासनिक उदासीनता के कारण प्रभावित न हो।
राष्ट्र की जिम्मेदारी उस समय समाप्त नहीं होती, जब सैनिक तिरंगे में लिपटकर घर लौटता है। उसके बाद भी यह जिम्मेदारी उसकी माता, उसकी पत्नी, उसके बच्चों और उसके परिवार के भविष्य के रूप में जारी रहती है।
सच्ची राष्ट्रभक्ति का प्रमाण केवल स्मारकों, भाषणों और तस्वीरों से नहीं, बल्कि इस बात से मिलता है कि राष्ट्र अपने वीरों के परिवारों की कितनी जिम्मेदारी उठाता है।
इस शौर्य दिवस पर राष्ट्र से मेरा एक ही सवाल है—क्या हम अपने शहीदों को केवल याद करते रहेंगे, या उनके सर्वोच्च बलिदान का सम्मान उनके परिवारों को अधिकार, सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन देकर भी करेंगे?
शहीद के नाम पर स्मारक बनाना सम्मान है, लेकिन यह सुनिश्चित करना कि उसका परिवार असहाय न रहे—उसके बलिदान के प्रति राष्ट्र का सच्चा कर्तव्य है।
