स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जानने से , राष्ट्र प्रेम की भावना का संचार होता है । ' हीरालाल जयंती पर पद्मश्री बाबूलाल दाहिया का उद्बोधन । कटनी / इतिहास हमेशा विजेताओं का होता है , विजित का नहीं । क्योंकि पराजित होने वाला या तो प्राणोत्सर्ग कर चुका होता है या फिर बंदीगृह में होता है । यदि इनका इतिहास खोजा जाए तो वह भूसे के ढेर से सुई खोजने जैसा होता है । सन 1857 की स्वतंत्रता क्रांति में महाकौशल एवं विंध्य क्षेत्र से देश की आजादी के लिए प्राणोत्सर्ग करने वालों की लंबी फेहरिस्त है । कहने की आवश्यकता नहीं कि आम लोगों तक मजबूत पकड़ होने के कारण उनके दिलों में क्रांति की अलख जगाने वाले यही छोटी रियासतों के राजा और जागीरदार रहे हैं । जबकि बड़े राजा और रियासतें तो अंग्रेजों के साथ खड़े स्वतंत्रता क्रांति को विफल करने का काला इतिहास गढ़ रहे थे । स्वतंत्रता क्रांति के इस महासमर में यदि गोंडवाना के 80 वर्षीय राजा शंकरशाह थे तो विजयराघवगढ़ के 17 वर्षीय युवराज सरयूप्रसाद सिंह , रामगढ़ की वीरांगना अवंती बाई एवं विंध्य के सपूत बाबा रणमत सिंह जैसे क्रांतिकारी अपने शौर्य एवं पराक्रम से अंग्रेज सत्ता को भयभीत किए हुए थे । दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन देशप्रेमी क्रांतिकारियों का इतिहास उचित ढंग से रेखांकित नहीं किया गया । और इनकी स्मृति सुरक्षित रखने के प्रयास भी नहीं किए गए । युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास खोज खोज कर पढ़ना चाहिए , ताकि उनमें राष्ट्र प्रेम की भावना का संचार बना रहे । उक्तशय के उद्गार गत 01 अक्टूबर हीरालाल जयंती के अवसर पर शासकीय कन्या महाविद्यालय कटनी सभागार में इंटैक कटनी चेप्टर द्वारा आयोजित ' रायबहादुर हीरालाल स्मृति व्याख्यानमाला ' में समारोह के मुख्य अतिथि पद्मश्री बाबूलाल दाहिया द्वारा व्यक्त किए गए । समारोह में तत्कालीन विजयराघवगढ़ रियासत के क्रांतिकारी युवराज सरयूप्रसाद सिंह की वंशजा शारदा देवी सिंह , विंध्य केशरी क्रांतिकारी रणमत सिंह के वंशज कृष्णेंद्र सिंह बघेल , स्व. से. उत्तराधिकार परिवार संगठन के प्रदेश पदाधिकारी अरुण प्रताप सिंह बघेल , मानव जीवन विकास समिति बिजौरी सचिव निर्भय सिंह एवं योगेश योगी विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन रहे । इस अवसर पर तत्कालीन विजयराघवगढ़ रियासत के क्रांतिकारी कैलवारा थानेदार अमर शहीद रामप्रसाद दुबे के परिवार द्वारा उपलब्ध कराई गई तोप एवं अमर शहीद ठाकुर रणमत सिंह की तलवार सहित रायबहादुर हीरालाल जी की पुस्तकों एवं छायाचित्रों का प्रदर्शन भी किया गया । साथ ही स्मृतिशेष कवि श्यामनारायण मिश्र द्वारा 1992 में रचित विजयराघवगढ़ रियासत की वीरांगना वीरा नयनी की लघु शौर्य गाथा का पुनर्मुद्रित कृति एवं पान उमरिया के ग्रामीण अंचलों में प्रचलित पचेली बोली की काव्य कृति ' पचेली काव्य वीथिका ' का लोकार्पण भी किया गया । कार्यक्रम संचालन मोहन नागवानी एवं आभार प्रदर्शन महाविद्यालय प्राचार्या डा. चित्रा प्रभात द्वारा किया गया । इस अवसर पर महाविद्यालय परिवार से डा. अमिताभ पांडे , डा. विमला मिंज , डा. सुनील कुमार , डा. रोशनी पांडे , डा. शिल्पी सिंह , डा. राजीव मिश्रा , डा. अंजय तिवारी ,डा. फूलचंद कोरी , प्रेमलाल कनवारे , पंकज सेन , एन. एस. एस. वॉलेंटियर तनिषा सोनखरे , शुभश्री दुबे , भूमि बैरागी , पूनम चक्रवर्ती , साक्षी रजक , वर्षा पटेल इंटैक परिवार से भारती नागवानी , रजनी सिंह , राजेंद्र सिंह ठाकुर , आशीष नामदेव, जुगल किशोर मिश्रा , सुधीर सिंघानी , अनिल लालवानी , अनिल नेमा सहित अभिजीत सिंह , सत्यम पांडे , विश्वनाथ सोनी , सुभाष दुबे , बालमुकुंद मिश्रा , सूर्यकांत बाजपेई , राम बजाज , सौरभ नायक , प्रकाश बर्मन सहित बड़ी संख्या में महाविद्यालय की छात्राओं की उपस्थिति रही ! सुनील नायक की रिपोर्ट