करनल (डा.) देव आनंद लोहामरोड़

आज वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था ऐसे मोड़ पर है, जहाँ युद्ध, प्रतिबंध, समुद्री मार्ग, पाइपलाइन और टैरिफ एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ से 2024 में औसतन लगभग 20.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन, यानी वैश्विक पेट्रोलियम-तरल खपत का करीब 20 प्रतिशत, गुजरा था। वहीं बाब-अल-मंदेब से लगभग 4.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन का प्रवाह हुआ, जबकि 2023 में यह लगभग 9.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन था। 2026 की दूसरी तिमाही में हॉर्मुज़ का प्रवाह घटकर लगभग 4.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया। ऐसे समय में सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर हमला और अरामको की कुछ यूरोपीय तथा भारतीय ग्राहकों को तेल आपूर्ति प्रभावित होने की खबर वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए गंभीर संकेत है। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की राष्ट्रपति को मिली शक्ति भारत के लिए ऊर्जा और व्यापार—दोनों मोर्चों पर चुनौती बढ़ाती है।

यह संकट केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। भारत दुनिया के प्रमुख तेल आयातकों में है और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल की नियमित तथा प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि समुद्री मार्ग बाधित हों, सऊदी आपूर्ति प्रभावित हो और रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव बढ़े, तो भारत के सामने प्रश्न होगा कि तेल कहाँ से, किस कीमत पर और किस जोखिम के साथ खरीदा जाए।

सऊदी अरब की लगभग 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पूर्वी तेल क्षेत्रों को लाल सागर स्थित यान्बू से जोड़ती है। इसका उद्देश्य ही हॉर्मुज़ से बचते हुए सऊदी तेल को वैकल्पिक मार्ग से वैश्विक बाजार तक पहुँचाना था। लेकिन इस वैकल्पिक रास्ते पर भी ड्रोन हमलों ने पंपिंग स्टेशनों और यान्बू में तेल लोडिंग को प्रभावित किया। अरामको ने कुछ यूरोपीय ग्राहकों को अक्टूबर की आपूर्ति नहीं देने की सूचना दी, जबकि प्रभावित रिफाइनरों ने वैकल्पिक स्रोत तलाशने शुरू कर दिए।

इसका महत्व इसलिए है क्योंकि तेल की शक्ति केवल उसके भंडार में नहीं, बल्कि उसे दुनिया तक पहुँचाने वाले सुरक्षित मार्गों में है। हॉर्मुज़, बाब-अल-मंदेब और अब सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन—इन तीनों पर दबाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को अधिक संवेदनशील बनाता है।

भारत के लिए सऊदी अरब लंबे समय से महत्वपूर्ण तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। इसलिए सऊदी आपूर्ति में व्यवधान का असर केवल उपलब्ध बैरल पर नहीं, बल्कि वैकल्पिक तेल की कीमत पर भी पड़ सकता है। यदि भारत को अधिक मात्रा में अमेरिका, अफ्रीका या लैटिन अमेरिका से तेल खरीदना पड़े, तो परिवहन, बीमा और मालभाड़े की अतिरिक्त लागत सामने आ सकती है।

इसी समय रूस के तेल का प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत ने पिछले वर्षों में रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाकर अपनी आपूर्ति के स्रोतों को विविध बनाया। अब अमेरिका का नया कानून राष्ट्रपति को रूस की ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर उनके उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ स्वतः लागू नहीं हुआ है; वास्तविक दर और उसके इस्तेमाल का निर्णय अलग विषय है।

फिर भी इसका संभावित आर्थिक प्रभाव गंभीर हो सकता है। यदि भारत पर अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ लगाया जाता है, तो अमेरिका को निर्यात करने वाले भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है। कपड़ा, परिधान, इंजीनियरिंग और अन्य निर्यात क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, यदि रूसी तेल की जगह महंगा तेल खरीदना पड़ता है, तो रिफाइनिंग लागत, व्यापार घाटे और घरेलू महंगाई पर भी असर पड़ सकता है।